December 1, 2022
Poem On Ganga River In Hindi

12+ Poem On River in Hindi | गंगा नदी पर कविता

Poem On River In Hindi  आज हम आपके लिए लेके आये है नदियों पर कविता Nadi Par Kavita . यह Collection of river poem  आपको जरूर पसंद आएगा किउकी इस आर्टिकल मै हमने  भारत के खाश नदी के कविता को छांट के लेके आये है जैसे की गंगा नदी पर कविता, यमुना नदी पर कविता आदि। 

हमने इस आर्टिकल को बचो  ध्यान मे रखते हुवे लिखा है  किउकी यह कविता बचो के आने वाले परीक्षा मई भी पूछे जा सकते है इसीलिए यह नदी पर कविता Class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, & 9 के लिए भी हैं। 

आपको और भी ऐसे ब्लॉगस पढ़ने है तो चैक कीजिये हमारे वेबसाइट –

Ganga River Poem in Hindi

गंगा नदी पर कविता | Poem On Ganga Maa | Poem On Ganga River In Hindi

गंगा की कल-कल धारा,

कहती तू रुक जा रे।

मैं कहती गंगा तू बहती जा रे,

तट है, तेरा बड़ा निराला।

बहती जिसमें निर्मल धारा,

धाराएँ बहती जाती हैं।

तू कभी नहीं रुक पाती है,

लहरें कुछ गुन-गुन गाती हैं।

महिमा पर कुछ इतराती है,

पदनख की याद दिलाती हैं।

तेरी पावन गरिमामय स्वर में,

अपना राग मिलाती हैं।

मैं श्रांत पाथिनी हास-त्रास में,

जीवन ढोती चलती हूँ।

करती हूँ नमन, पुण्य सलिल,

अपराध बोध दुहराती हूँ।

मेरी कुंठा में पतित पावनी,

तुम मत अपना झाग भरो।

बहती जाओ सागर तट में,

सागर में सलिल सुहाग भरो।

तेरे तट पर मानव संतति,

कृति गाथा गाएगी।

निर्मल जल में तन-मन धोकर,

मानवता फिर इतराएगी।

-वंदना वात्स्यायन


ये गंगा की धुँधली तलहटी या,

या उसकी ममता का पसरा आँगन !

हर सुबह ..

नजर आती है मंदाकनी का फैला जहाँ,

और छितिज पर गुलाबी आभा मिलती हुई !

बचपन …

ये बचपन का नाता कुछ पुराना,

तट भागीरथी और अबोध नजरे मेरी,

रोज देखती उस और किसी सवाल से..

थी उम्र जब तेरी माटी पर लोटा,

वो कोतुहल अल्हरता तुझसे जो समझा !

और जब हर साँझ थका हारा इस जिंदगी से,

खामोश से खरा उस बालूचर किनारों पर तेरे,

लगती एक प्रेयसी सी जाहनवी तेरी फैली बाहें,

करते बातें जैसे घंटो टिकाये नजरों एक ओर !

शायद जीवन के इन हर भावों को सिखा तुझसे,

मंदाकिनी की चपलता, वेग संवेग निरंतरता,

तो देखा कभी सरिते तेरी उफान उछाल लहरों को !

देखा उस मांझी को, ना भाव ना कोई लकीरे माथे पर,

एक मस्ती में पतवार, और दो गीत के धुन होठों से,

यूँ बटोरा साहस इस जग नैया को पार लगाने की !

भगीरथी तेरा प्यार पर लगता अकिंचन हम,

यूँ जीवन की धारा थमे सुरसरिता की इसी माटी पर,

और माँ सी कोमल तू पखार ले जाये हर कण कण !

(nadi par kavita)


Poem On Ganga River | Ganga Nadi Par Kavita | गंगा पर प्यारी सी कविता

नदियों के जल जब निर्मल होंगे,

गंगा जल अमृत बन जाएगा।

जन-जन में जब आस जागेगी,

गंदगी न कोई फैलाएगा।

मुर्दाघाट जब अलग बनेगा,

कोई लाश नहीं दफनाएगा।

स्नान हेतु लोग आया करेंगे,

कर के स्नान चले जाएंगे।

फिर दूषित न हो पाएगा,

सब जल में दीप जलाएंगे।

हर-हर गंगा लोग करेंगे,

फिर वह मौसम आएगा।

(nadi par kavita)


भगीरथ की तपस्या का फल,

शिव जटाओं के खुल गए बल।

गंगा अवतरण हुआ धरती पर,

प्रवाहित मोक्षदायी अमृत जल।।

गंगोत्री हिमनद नामक गोमुख,

गंगा का उद्गम स्थल यही प्रमुख।

मंदाकिनी बल खाती लहराती,

चीरती बाधाएँ जो मिलीं सम्मुख।।

हिमालय से बंगाल की खाड़ी,

बहती गंगा नदी तिरछी आड़ी।

विशाल भूभाग को देती जल,

दौड़ती पार कर मैदान पहाड़ी।।

जन जन की आस्था का आधार,

मोक्षदायिनी दैवीय भू अवतार।

पाप विमोचनी हर हर गंगे,

पवित्र जल कराता वैतरिणी पार।।

सीमा वर्णिका – कानपुर (उत्तर प्रदेश)


Poem On River Yamuna 

यमुना पर प्यारी सी कविता | Yamuna par kavita | Short Poem on River

नदियों की वो रानी थी

उसमें खूब रवानी थी

उसकी एक कहानी थी

एक नदी थी मेरे शहर की

जहाँ जहाँ वो जाती थी

धरा वहाँ चिलकाती थी

हरी भरी लहराती थी

एक नदी थी मेरे शहर की

अब खूब गिरे गंदला काला

शासन के मुंह पर ताला

एक नदी थी मेरे शहर की

आज बनी गंदा नाला


 

नदियों की वो रानी थी,

उसमें खूब रवानी थी,

उसकी एक कहानी थी,

एक नदी थी, मेरे शहर की,

जहाँ जहाँ वो जाती थी,

धरा वहाँ चिलकाती थी,

हरी-भरी लहराती थी,

एक नदी थी, मेरे शहर की,

अब खूब गिरे गंदला काला,

शासन के मुंह पर ताला,

एक नदी थी मेरे शहर की,

आज बनी गंदा नाला,

(nadi par kavita in hindi)


Bhagirathi par Choti si Kavita (Poem)

तेरी गोद मे आकर मैं गोते चार लगा हूँ

खुद की थकान को मिटाकर धन्य मैं हो जाता हूँ

तेरी लहरों से डरता हूँ क्योंकि तैर नही मैं पाता हूँ

तेरे शीतल जल मे माँ मैं खूब नहाता हूँ

देख के इंसानों की करनी माँ मैं दुखी बहुत हो जाता हूँ

अपने सारे पापों को धोकर मैला तुझको कर जाता हूँ

कितनी पावन पवित्र हो माँ तुम

फ़िर क्यों कचरा ,फैक्टरियों से गंदा पानी इंसान तुममे गिरवाता है

जन्म से लेकर मरने तक हर जगह तुझे ही पाता हूँ

भोलेनाथ की जटा से निकली भागीरथी मैं तुझको शीश झुकाता हूँ ……


Short Poem On River In Hindi | Nadi Par Choti Kavita 

कल कल करती नदी की धारा,

बही जा रही बढ़ी जा रही।

प्रगति पथ पर चढ़ी जा रही,

सबको जल ये दिये जा रही।

पथ न कोई रोक सके,

और न कोई टोक सके।

चट्टानों से टकराती है,

तूफानों से भीड़ जाती है।

रूकना इसे कब भाता है,

थकना इसे नहीं आता है।

सोद्देश्य स्व-पथ पर पल पल,

बस आगे बढ़ती जाती है।

कल -कल करती जल की धारा,

जौहर अपना दिखलाती है।


बहता है नदिया का पानी

इठलाता सा बलखाता सा

झूम झूम कर लहराता सा

कहता है ये कोई कहानी

शहर शहर हो या गांव गांव

या फिर हो कोई कच्ची ढाणी

बहता है नदिया का पानी

हिमखंडो को ये पिघलाकर

तूफानों को पीठ दिखाकर

टेढ़ी-मेढ़ी धार बनाकर

करता है अपनी मनमानी

बहता है नदिया का पानी

कल कल करके बहता जाता

राग कोई ये नया सुनाता

मिट्टी को उपजाऊ बनाता

प्यासो की ये प्यास बुझता

दूर करकरे सारी परेशानी

बहता है नदिया का पानी

(nadi par kavita in hindi)


Hindi Kavita Nadi Par | Nadi Par Kavita In Hindi

नौकाएँ लौट आई हैं

घाटों पर, दोनों ओर

हवाओं का भीषण शोर

एक सोई हुई नदी की नींद में पड़ चुका है ख़लल

स्याही ढल चुकी है ढेर सारी

आसमानी स्लेट पर

चोट खाई नागिन-सी

फुफकारती हैं फ़ेनिल लहरें

कामातुर नदी, बेचैन होकर

बदलती है करवटें,

ये इसके अभिसार के दिन हैं

धन्य हे काल वैशाखी,

धन्य तुम्हारा यह रूप ।


आज कुछ पानी है नदी में..

कभी बहती थी… ..

कल-कल, झर-झर…

वेगवती-सी…

झूमती-नाचती…..

अल्हड़ युवती सी…

पर आज, कुछ चुप-सी हो गयी है..

न जाने किन गमो में खो गयी है

लगता है…

बादल नाराज़ हो गए हैं इससे..

ना ही बरसते हैं अब…

ना ही गरजते हैं अब ..

अपना सूना आँचल फैलाए….

किसी के इंतज़ार में बैठी है ..

आज कुछ नमी है,

इसकी आँखों में…

आज कुछ पानी है नदी में…

लेकिन धरा को हरा-भरा करने की चाहत

आज भी इसके..

मन में उमड़ती है…

आज भी ये लाखों-करोड़ों को,

जीवन देने को तरसती है…

पर अपनों के हाथों ही….

सूखी पड़ गयी है ये…

अब किनारे भी …

दूर हो गए हैं इससे….

किससे अपना दर्द कहे…

यही विचारती है मन में….

हाँ, आज ‘कुछ’ पानी है नदी में..


River Poem In Hindi | Nadi Poem In Hindi | Poems About Rivers in Hindi

नदी बहती है हर क्षण

बदलती है हर क्षण

बिन बदले हुए।

कभी पहाड़ो से पर्वतों से

गुफाओं से जंगलों से

मैदानों से गुजरते हुए

सागर बन जाती है।

बनते हुए

कभी झरना कभी नाली

कभी झील कभी भाप

कभी बादल कभी सागर

कभी बारिश की बूंदे

कभी पत्तों का खाना

कभी पशुओं कि प्यास।

भिन्न समय में भिन्न स्थान में

भिन्न रूप में भिन्न स्वरूप में

भिन्न होते हुए भी अभिन्न है


दोस्तों  मैं आसा करता हु की यह Poem On River in Hindi आपको अच्छा लगा होगा , अगर आपको यह कविता आपको पसंद आई हो तोह आपको हमारी और भी articles  पसंद आएँगी जैसे की Poem On Life In Hindi , Desh Bhakti Kavita Poem in Hindi । अगर आपको अपनी कविता को फीचर करना है तोह आप हमे कमेंट करके बता सकते है। 

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